ब्यूरो रिपोर्ट।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक अहम मामले में मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की पहली पत्नी की मृत्यु उसके जीवनकाल में हो चुकी हो और पेंशन का कोई अन्य दावेदार न हो, तो दूसरी पत्नी को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।मामले के अनुसार, एक सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी ने पारिवारिक पेंशन के लिए याचिका दायर की थी। कर्मचारी ने याचिकाकर्ता से विवाह उस समय किया था जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। पहली पत्नी की कोई संतान नहीं थी और वर्ष 2015 में उनका निधन हो गया। इसके बाद वर्ष 2021 में कर्मचारी की मृत्यु हो गई। दूसरी पत्नी से कर्मचारी के दो बच्चे हैं।राज्य सरकार ने फरवरी 2022 में दूसरी पत्नी के पेंशन दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह विवाह पहली पत्नी के जीवित रहते हुआ था, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं है।हालांकि, न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पहली पत्नी की मृत्यु कर्मचारी के जीवनकाल में ही हो चुकी थी और उनका कोई वारिस नहीं था। ऐसे में याचिकाकर्ता के अलावा पेंशन पर दावा करने वाला कोई अन्य पक्ष नहीं है, जिससे किसी के अधिकार प्रभावित नहीं हो रहे।अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि एक पुरुष और महिला लंबे समय तक साथ रहते हैं, तो कानून ऐसे संबंध को विवाह के रूप में मान्यता दे सकता है।कोर्ट ने राज्य सरकार के पुराने आदेश को रद्द करते हुए संबंधित विभाग को तुरंत पेंशन जारी करने के निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता को मई 2026 से नियमित मासिक पेंशन दी जाएगी, जबकि सभी बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करना होगा।साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो बकाया राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
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