शिमला ब्युरो : हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला द्वारा भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के लिए “जल संरक्षण के लिए स्प्रिंगशेड प्रबंधन और सतत जल प्रबंधन” विषय पर आयोजित किए जाने वाले पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आज दिनांक 23 सितम्बर 2024 को श्रीमती कंचन देवी, महानिदेशक, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, देहारादून द्वारा शुभारंभ किया गया । इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 27 वन अधिकारी भाग ले रहे हैं। महानिदेशक महोदया ने अपने सम्बोधन में कहा कि भारत और पूरी दुनिया, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की कमी के कई कारण हैं । पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषकर पहाड़ी चोटियों पर पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। अधिकांश पर्वतीय राज्यों में जल आपूर्ति झरनों पर निर्भर है। अतः देश के सभी पर्वतीय क्षेत्रों में उचित स्प्रिंगशेड प्रबंधन नितांत आवश्यक है। स्प्रिंगशेड प्रबंधन झरनों और भूमि के उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करके पानी को संरक्षित करने और स्थायी जल प्रबंधन सुनिश्चित करने का एक तरीका है जो भूजल में योगदान देता है। झरने पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं, खासकर पहाड़ी समुदायों के लिए, लेकिन जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण वे सूख सकते हैं। झरना वह स्थान है जहां जमीन के नीचे से पानी प्राकृतिक रूप से सतह पर बहता है। इस शब्द की उत्पत्ति जर्मन शब्द ‘स्प्रिंगर’ से हुई है, जिसका अर्थ है ‘जमीन से गोद लेना’। हालाँकि, वर्षा की स्थिति और पैटर्न पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण हिमालयी क्षेत्रों में झरने के पानी की आपूर्ति तेजी से अनिश्चित होती जा रही है, जिससे वर्षा की तीव्रता में वृद्धि, अस्थायी प्रसार में कमी और सर्दियों की बारिश में उल्लेखनीय गिरावट आई है। जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है, जिससे वर्षा पैटर्न अनियमित हो गया है और नदियों और जलभरों/ स्प्रिंगशेडों के पुनर्भरण पर असर पड़ा है। खराब जल प्रबंधन और उचित बुनियादी ढांचे की कमी भी संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए, स्प्रिंगशेड प्रबंधन के साथ-साथ जल संसाधनों का प्रबंधन करना और भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भारत सरकार विशेष रूप से जल जीवन मिशन और हर घर जल के माध्यम से सहभागी स्प्रिंगशेड प्रबंधन के माध्यम से पहाड़ों में पीने योग्य पानी के प्रावधान पर ध्यान केंद्रित कर रही है। अपने सम्बोधन के अंत में उन्होंने कहा कि मैंने स्प्रिंगशेड प्रबंधन के कुछ प्रमुख पहलुओं को उजागर करने और समझाने की कोशिश की है, हालांकि, विशेषज्ञ संकाय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान अपने व्याख्यान और क्षेत्र दौरों के माध्यम से आपको और अधिक जानकारी प्रदान करेंगे। मुझे आशा है कि विशेषज्ञों द्वारा अनुभव साझा करने से आप सभी लाभान्वित होंगे और अपने-अपने क्षेत्र में उन मुद्दों को कार्यान्वयन करने का प्रयास करेंगे, जिन पर इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में चर्चा की जाएगी।
इससे पहले संस्थान के निदेशक, डॉ. संदीप शर्मा ने आज के कार्यक्रम की मुख्य-अतिथि, श्रीमती कंचन देवी, महानिदेशक, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, देश के विभिन्न राज्यों से प्रशिक्षण में भाग लेने आए वन अधिकारियों का स्वागत तथा अभिनंदन किया तथा संस्थान द्वारा वानिकी अनुसंधान के क्षेत्र में की जा रही गतिविधियों से अवगत करवाया । वर्तमान प्रशिक्षण कार्यक्रम पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल संचयन की गौरवशाली परंपरा रही है। स्थानीय समुदायों ने अपनी स्वयं की स्प्रिंग आधारित हाइड्रोलिक तकनीक विकसित की है, जो अपनी उपयोगिता और स्प्रिंग पुनरुद्धार में काफी अद्वितीय है। जल प्रबंधन का पारंपरिक ज्ञान देश के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ऐसा ही है। पूंजी के साथ-साथ स्प्रिंग-आधारित गुरुत्वाकर्षण प्रवाह के संचालन और रखरखाव में अंतर्निहित तकनीकी सादगी और लागत प्रभावशीलता, उन्हें पहाड़ों में पसंदीदा पेयजल विकल्प बनाती है। ऐसे स्प्रिंग स्रोतों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए, जल सुरक्षा प्राप्त करने के लिए स्प्रिंगशेड प्रबंधन को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हुए प्रशिक्षण समन्वयक, श्री कुलदीप शर्मा, भा. व.से., अरण्यपाल ने प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की । उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा देश के नामी विषय विशेषज्ञों को प्रशिक्षु अधिकारियों के ज्ञानवर्धन एवं मार्गदर्शन हेतु आमंत्रित किया गया है तथा इस दौरान स्प्रिंगशेड प्रबंधन के बारे में प्रशिक्षु अधिकारियों को स्प्रिंगशेड प्रबंधन के बारे में परिचित कराने के लिए एक क्षेत्रीय भ्रमण/ फील्ड विजिट का आयोजन भी किया जाएगा । उन्होंने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों को हिमाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति और विरासत से अवगत करवाने हेतु एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाएगा। उन्होंने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार को इस कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेवारी हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला को देने के लिए धन्यवाद किया ।
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