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राजगढ़ : लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका : सुरेश भारद्वाज

राजगढ़ (निशेष शर्मा/संवाददाता),

संसदीय प्रणाली के अंतर्गत राजनीति दल लोकतंत्रीय प्रक्रिया में अधिक सार्थक भूमिका निभाते है। भारत में मुख्य रूप से दो दलों की प्रधानता रही है जिससे कभी एक को संसद में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो जाता, कभी दूसरे को। इसका परिणाम होता है सुदृढ़ सरकार और सुदृढ़ विपक्ष। एक ही दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने पर शासन की अस्थिरता का खतरा नहीं रहता। दूसरी ओर दूसरा प्रमुख दल भी संगठित रहकर विपक्ष की भूमिका पूरी तत्परता से निभाता है। यदि विपक्ष संगठित न हो तो वह शासन की सारी गतिविधियों की वियस्थित जांच और उनकी आलोचना नहीं कर सकता छुटपुट आलोचनाओं का कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। केंद्र में 2014 में लगभग एकतरफा लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से ही विपक्षी एकता की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। समय समय पर इस दिशा पर कोशिश भी की जा रही है पर कोई नतीजा नहीं निकला, क्योंकि कभी दलगत हित आड़े आ रहे थे और कभी नेताओ की सत्ता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ,दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी.आर. और उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कांग्रेस से एलर्जी खुला रहस्य है। इस महीने सागरदीघी विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस से हारने के बाद ममता ने ऐलान किया था कि अगला  लोकसभा चुनाव तृणमूल कांग्रेस अकेले लड़ेगी। फिर ममता से मिलने पहुंचे अखिलेश यादव ने संकेत दिया कि उनका प्रस्तावित तीसरा मोर्चा, कांग्रेस और भाजपा से सामान दूरी रखेगा। केजरीवाल और के.सी.आर. की राजनीति कमोवेश यही रही हैं, लेकिन गत वृहस्पतिवार को जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को मानहानि मामले में सूरत की अदालत ने दो साल की सजा सुनाई और परिणामस्वरूप अगले ही दिन उनकी लोकसभा सदस्यता भी समाप्त कर दी गई, उसके बाद मोदी सरकार और भाजपा के विरुद्ध तमाम विपक्षी नेता एक सुर में बोलते नजर आ रहे है। ममता से लेकर केजरीवाल और अखिलेश तक तमाम विपक्षी नेताओं ने इसे विपक्ष की आवाज बंद करने की कोशिश करार देते हुए मोदी सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया है। विपक्षी नेताओं की टिप्पणियों से ध्वनि यह भी निकल रही है कि सबको मिलकर लड़ना पड़ेगा।लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है और जो जीता वही सिकंदर। इसलिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों को भी सम्मान भाव से देखना चाहिए और वैचारिक आधार पर उनके साथ समन्वय भी बनाकर चलना चाहिए। ऐसा नहीं है की राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों से गठबंधन नहीं करते। आज भी केंद्र में भाजपानीत एन.डी.ए. सरकार है। उससे पहले 10 साल तक कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार थी। समस्या यह है कि क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय दलों का व्यवहार युज एंड थ्रू वाला रहता है जो अपमानजनक ही नहीं अलोकतांत्रिक भी है। यही कारण है कि जब 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट गई और 2019 में भी 53 तक ही पहुंच पाई ,तो क्षेत्रीय दलों ने उसका नेतृत्व मानने से किनारा कर लिया। आवश्यकता यह है कि पार्टी संगठन में सुधार किया जाए, लामबंदी के लिये आगे बढ़ा जाए और जनता को संबंधित पार्टी कार्यक्रमों से परिचित कराया जाए। इसके साथ ही, पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र के समय-समय पर मूल्यांकन के लिये एक तंत्र भी अपनाया जाना चाहिये। जहाँ हमारी राजव्यवस्था ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली का पालन करती हो, विपक्ष की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। भारत के लिये एक सच्चे लोकतंत्र के रूप में कार्य करने हेतु एक संसदीय विपक्ष-जो राष्ट्र की अंतरात्मा है, को संपुष्ट करना महत्त्वपूर्ण है।

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