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50 साल पहले कैसी थी सिरमौर की होली

जिला सिरमौर में आज से 50 वर्ष पहले होली का स्वरूप बहुत अलग था । हालांकी इस त्योहार को काफी उत्साह के साथ मनाते थे। किंतु संसाधनों के अभाव की वजह से होली का नजारा आज की तरह नहीं हुआ करता था ।

हमने कुछ बुजुर्गों से बात की तो उन्होंने बताया कि उनके समय में केमिकल से बने रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता था। वे लोग प्राकृतिक रूप से ही रंगों को बनाते थे । जैसे कि चिड़ के पत्तो से निकलने वाला पीला रंग ,हल्दी, गेहूं और जौ के आटे , इन सब का इस्तेमाल रंगों के रूप में किया जाता था । उन्होंने बताया कि उस समय गीली होली का ज्यादा प्रचलन था । काख( बांस) से पिचकारी बनाई जाती थी । कशमल(एक प्रकार की कंटीली झाड़ी ) की जड़ को उबालकर पीला रंग, ब्रांस के फूलों को पीसकर लाल रंग, सरसों के फूलों और पत्तियों को पीसकर गीला रंग तैयार किया जाता था । होली के एक दिन पहले सुखी होली और होली वाले दिन गीली होली खेली जाती थी । कुछ नौजवान मस्ती में गोबर ,राख और चूल्हे की कालिख के साथ भी होली खेलते थे ।


एक बुजुर्ग ने हमें ये भी बताया कि उस समय बहुत कम लोग ही इस पर्व में शामिल होते थे । क्योंकि गरीबी की वजह से ज्यादातर लोगों के पास एक _दो जोड़ी कपड़े ही होते थे । तो गांव के कुछ गरीब लोग होली से परहेज करते थे । नौजवान की टोली ढोल नगाड़े के साथ नाचते, गाते हुए कई गांव के चक्कर लगाते और आपस में प्रेम भाव से होली के पर्व को मनाते थे।

होली के दिन यहां के लोग विभिन्न प्रकार के स्थानीय व्यंजन जैसे सिडू , असकली, पुणे, खीर, लुशके, पटानठे इत्यादि व्यंजन बनाते थे । इसके अलावा होली के दिन धी- धैन( बेटियों) को मेहमान बुलाया जाता था और इन स्थानीय व्यंजन से उनका सत्कार किया जाता था । किंतु अब होली का स्वरूप बिल्कुल बदल गया है आधुनिक युग मैं होली का उत्साह तो बहुत है । किंतु पाश्चात्य संस्कृति की तरफ झुकाव होने के कारण हम अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों से दूर होते जा रहे हैं। जरूरत ये है कि होली के दिन हम अपनी परंपरा के रंगों को भी संजोकर रखें ।

कृष्णा ठाकुर (राजगढ़)

Himachal Darpan

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