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शिमला में 2025 में हुआ भूस्खलन ‘दैवीय आपदा’ था”, NHAI ने NGT से कहा- मुआवजा देना हमारी जिम्मेदारी नहीं

( ब्यूरो रिपोर्ट ),

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से कहा है कि मई 2025 में शिमला में हुआ भूस्खलन ‘दैवीय आपदा’ था इसलिए कृषि भूमि के मालिकों को मुआवजा देना उसकी जिम्मेदारी नहीं है। एनएचएआई ने जनवरी में दाखिल एक याचिका के जवाब में यह बात कही।

याचिका में दावा किया गया है कि प्राधिकरण और उसकी परियोजना क्रियान्वयन कंपनी द्वारा ढलान को ठीक से मजबूत किए बिना किए जा रहे भारी निर्माण कार्य से शिमला ग्रामीण तहसील में कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा और भूस्खलन हुआ। यह याचिका कुछ भूमि मालिकों ने एनएचएआई और उसकी उन एजेंसियों के खिलाफ दाखिल की थी, जो शकराल गांव से ढली (एनएच-5 के कैथलीघाट-ढली खंड) तक चार लेन की सड़क परियोजना के लिए सड़क चौड़ीकरण के काम में शामिल थीं। एनजीटी ने याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित प्राधिकरणों से जवाब मांगा था। एनएचएआई ने 18 मई को दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 25 मई की एक घटना का उल्लेख किया है, जब उसकी एजेंसी द्वारा बनाई गई ढलान को सहारा देने वाली एक दीवार क्षतिग्रस्त हो गई थी। जवाब में कहा गया, ”यह घटना पूरी तरह प्राकृतिक आपदा यानी दैवीय आपदा के कारण हुई। हिमाचल प्रदेश में मई 2025 के अंत से भारी बारिश हुई जिससे बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुए। इनमें वे क्षेत्र भी शामिल थे, जहां किसी भी तरह का कोई निर्माण कार्य नहीं किया जा रहा था या किसी परियोजना पर काम नहीं हो रहा था।”

एनएचएआई ने कहा कि यह घटना दैवीय आपदा थी जिसकी पुष्टि आईएमडी (भारत मौसम विज्ञान विभाग) की रिपोर्ट और राज्य सरकार द्वारा एक सितंबर, 2025 को जारी आपदा घोषणा से होती है। एनएचएआई ने एक भूखंड में 440 पेड़ों को कथित नुकसान और 32.3 लाख रुपये से अधिक के नुकसान के दावे पर शिमला ग्रामीण के उपमंडलाधिकारी (एसडीएम) से आग्रह किया कि वह बागवानी विभाग से अपनी रिपोर्ट की फिर से जांच करने और मौके के निरीक्षण पर आधारित नयी रिपोर्ट देने को कहें। एनएचएआई ने कहा कि यदि कोई मुआवजा दिया जाना है तो वह बागवानी विभाग के गलत और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए आकलन पर आधारित नहीं हो सकता। एनएचएआई ने कहा कि उसकी परियोजना क्रियान्वयन कंपनी ‘मैसर्स गावर शिमला हाईवे प्राइवेट लिमिटेड’ ने भी नुकसान का अपना आकलन किया और दावा किया कि बागवानी विभाग की नुकसान संबंधी रिपोर्ट ”गलत” है, क्योंकि प्रभावित भूमि पर सेब के केवल करीब 40 पेड़ थे।

जवाबी हलफनामे में भूमि को हुए नुकसान के दावे को भी खारिज किया गया। इसमें कहा गया कि यह भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत राजमार्ग परियोजना के लिए अधिग्रहण की प्रक्रिया में है और इस संबंध में इस साल 15 जनवरी को राजपत्र अधिसूचना जारी की जा चुकी है। जवाब में कहा गया, ”मुआवजा निर्धारण को अंतिम रूप दिए जाने के बाद पात्र भूमि मालिकों को कानून के अनुसार मुआवजे का विधिवत भुगतान किया जाएगा।” एनएचएआई ने कहा कि आवेदकों ने पर्यावरणीय मुआवजे की मांग की है, लेकिन वे यह साबित नहीं कर पाए कि एनएचएआई या उसकी परियोजना क्रियान्वयन कंपनी ने पर्यावरण मंजूरी या वन मंजूरी की किसी शर्त का कोई विशेष उल्लंघन किया है या उनकी किसी कार्रवाई या चूक से भूस्खलन हुआ। जवाब के अनुसार, जब कथित नुकसान पूरी तरह और केवल ऐसी असाधारण प्राकृतिक घटना के कारण हुआ, जिसका अनुमान लगाना या उसे रोकना संभव नहीं था तो एनएचएआई को इसके लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।

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