टटियाना पंचायत चयन पर विवाद: आस्था बनाम लोकतंत्र, चुनाव आयोग से जांच की मांग

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ददाहू ( हेमंत चौहान , संवाददाता ),

हिमाचल प्रदेश के टटियाना गांव में पंचायत गठन को लेकर विवाद गहरा गया है। यहां पारंपरिक मतदान प्रक्रिया के बजाय महासू महाराज को साक्षी मानते हुए “पर्ची व्यवस्था” से पंचायत का चयन किया गया। इस फैसले के बाद पूरे क्षेत्र में बहस छिड़ गई है कि क्या यह परंपरा और आस्था का सम्मान है या फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से समझौता।

जानकारी के अनुसार गांव में बिना मतदान कराए पर्ची डालकर पंचायत पदाधिकारियों का चयन किया गया। इसमें पूनम शर्मा को प्रधान, दाताराम शर्मा को उपप्रधान और प्रियंका शर्मा को बीडीसी सदस्य चुना गया। इस प्रक्रिया में न तो वोटिंग हुई और न ही सामान्य चुनावी प्रक्रिया अपनाई गई, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं।

शिमला के समाजसेवी रवि कुमार दलित ने इस चयन प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि पूरी प्रक्रिया संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि चयनित सभी पदाधिकारी सामान्य वर्ग से हैं, जबकि अनुसूचित जाति वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।

रवि कुमार दलित का कहना है कि पंचायत चुनाव में सभी लोगों को चुनाव लड़ने और मतदान करने का समान अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने इसे “राजशाही जैसी पुरानी व्यवस्था” बताते हुए कहा कि इस तरह की प्रक्रिया लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने राज्य चुनाव आयोग से मामले की निष्पक्ष जांच कराने और इस चयन प्रक्रिया को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि पंचायत का गठन धार्मिक आधार पर किया गया है, तो पंचायत संचालन का खर्च सरकारी फंड के बजाय मंदिर निधि से चलाया जाना चाहिए।

अब यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुद्दा परंपरा, आस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बड़ी बहस का रूप लेता जा रहा है। प्रशासन और राज्य चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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