शिमला (विकास शर्मा ,ब्यूरो चीफ),
ग्रामीण क्षेत्रों में खोले जाएँ CBSE स्कूल – राजकीय भाषाई अध्यापक संघ की मांग
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में CBSE बोर्ड के अंतर्गत 134 सरकारी विद्यालयों को लाने की अधिसूचना जारी की गई है। ये विद्यालय मुख्यतः कस्बाई एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में चिन्हित किए गए हैं। साथ ही, इन विद्यालयों में तैनाती हेतु पहले से कार्यरत सरकारी शिक्षकों के लिए एक चयन परीक्षा आयोजित करने का प्रावधान किया गया है। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड, धर्मशाला द्वारा 11 फरवरी 2026 को इस संबंध में परीक्षा शुल्क एवं अन्य मानदंडों की अधिसूचना भी जारी की जा चुकी है।
हिमाचल प्रदेश राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने इस पूरी प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है।
संघ के प्रदेशाध्यक्ष हेमराज ठाकुर, महासचिव अर्जुन सिंह, महिला मोर्चा अध्यक्षा मीरा शर्मा, सचिव डॉ. तारा, संस्थापक नरेन्द्र शर्मा, संयोजक धनवीर नायक सहित समस्त जिला पदाधिकारियों ने संयुक्त बयान में कहा कि —
👉 जब सरकार ने 134 विद्यालयों को CBSE से संबद्धता हेतु पंजीकृत किया, तब उन विद्यालयों में पहले से कार्यरत शिक्षकों को ही इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया था।
👉 CBSE द्वारा उन्हीं शिक्षकों की योग्यता को मानकों के अनुरूप स्वीकार करते हुए विद्यालयों को संबद्धता प्रदान की ।
👉 ऐसे में अब उन्हीं योग्य शिक्षकों को टेस्ट के माध्यम से बाहर करने का प्रयास करना पूर्णतः अन्यायपूर्ण एवं अव्यावहारिक है।
संघ अध्यक्ष हेमराज ठाकुर ने कहा कि यह प्रक्रिया शिक्षकों के बीच कृत्रिम श्रेष्ठता-हीनता का भाव उत्पन्न करेगी और शिक्षा व्यवस्था में अनावश्यक विभाजन पैदा करेगी।
उन्होंने गंभीर प्रश्न उठाया —
जब मौजूदा शिक्षक CBSE मानकों के अनुरूप योग्य हैं, तो फिर उन्हें हटाने की मंशा क्यों?
मुख्य आपत्तियाँ
🔹 CBSE विद्यालयों का चयन मुख्यतः कस्बाई क्षेत्रों में किया गया है, जबकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है।
🔹 ग्रामीण बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कस्बों की ओर पलायन करना पड़ता है, जिससे सामाजिक एवं पारिवारिक विघटन होता है।
🔹 अनेक ग्रामीण विद्यालय आज भी डेप्यूटेशन व्यवस्था पर चल रहे हैं – फिर भी नई सुविधाएँ शहरी क्षेत्रों को दी जा रही हैं, जहां पहले से ही अच्छे शिक्षण संस्थान मौजूद हैं। चाहे वे निजी स्कूलों के रूप में ही क्यों न हो। परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में तो हर तरह से अच्छे स्कूलों और अध्यापकों का अभाव रहता है ।
🔹 यह कदम शिक्षा के अधिकार अधिनियम, NCERT मानकों एवं नई शिक्षा नीति की समावेशी भावना के भी विपरीत है।
🔹 इससे शिक्षा व्यवस्था में दोहरे मानदंड स्थापित होंगे —
“कुछ बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्राप्त होगी तो , कुछ को डेप्यूटेशन आधारित व्यवस्था”। जबकि राज्य के समस्त बच्चों को एक समान सुविधा सम्पन्न शिक्षा प्रदान करने राज्य सरकार का प्रथम दायित्व बनता है। फिर यह शहरी बनाना ग्रामीण में भेदभाव क्यों? यह समामेशी शिक्षा पर भी सवाल खड़े करता है!
संघ की मांग
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