कुल्लू (आशा डोगरा ,सब एडिटर ),
पुरातन संस्कृति के रंग में सराबोर रहा फागली उत्सव
कुल्लू जिला की सराज घाटी एक बार फिर अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की साक्षी बनी, जब यहां देव और दैत्य के बीच महायुद्ध की परंपरागत पुनरावृत्ति के साथ फागली उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। यह अनूठी परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और सराज घाटी की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा मानी जाती है।
देव श्री बड़ा छमाहूं के पुजारी धनेश गौतम ने बताया कि सराज घाटी का फागली उत्सव देव–दैत्य युद्ध से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध हुआ था, जिसमें अंततः दैत्यों को पराजय का सामना करना पड़ा। युद्ध के पश्चात दैत्यों ने देवताओं से यह आग्रह किया कि उन्हें भी अपनी परंपराओं के निर्वाह के लिए विशेष स्थान और समय दिया जाए, ताकि उनकी संस्कृति सदियों तक जीवित रह सके।
देवताओं ने दैत्यों की यह शर्त स्वीकार की और उन्हें पौष महीने के आठ दिन तथा संपूर्ण माघ माह अपनी परंपराओं के अनुसार उत्सव मनाने का अधिकार दिया। तभी से आज तक माघ माह में मुखोटों के रूप में दैत्यों का प्रतीकात्मक शासन माना जाता है। इन दिनों सराज घाटी में मुखोटों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच मुखोटा नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
इसी परंपरा के तहत माघ माह के दूसरे दिन आज सराज घाटी के कंढी गांव में एक भव्य आयोजन हुआ, जहां आसपास के विभिन्न गांवों से देव-दैत्य के प्रतीक मुखोटे पहुंचे। देवता करथा नाग के प्रांगण में सैकड़ों मुखोटाधारियों ने एक साथ नृत्य कर वातावरण को रोमांचक और भक्तिमय बना दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप पर मुखोटाधारियों का यह नृत्य देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
इस दौरान आम लोग भी मुखोटाधारियों के साथ झूमते नजर आए। कार्यक्रम के अंत में परंपरा के अनुसार देव और दैत्यों के मिलन व आपसी समझौते का दृश्य प्रस्तुत किया गया, जो आपसी सौहार्द, सह-अस्तित्व और संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
फागली उत्सव ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सराज घाटी की लोकसंस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सामूहिक एकता की जीवंत अभिव्यक्ति है
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