ऊना ( अक्की रतन , सवाददात )
चिंतपूर्णी (हिमाचल प्रदेश)। देश-विदेश में सत्संग के माध्यम से लाखों लोगों को नशामुक्त, शाकाहारी और सदाचारी जीवन की प्रेरणा देने वाले परम पूज्य बाबा उमाकांत जी महाराज ने कहा कि सच्चे संतों का सत्संग, नामदान और अच्छे कर्म ही मनुष्य के लोक-परलोक को संवारने का माध्यम बनते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु की विशेष कृपा से ही मनुष्य को सच्चे सत्संग का अवसर प्राप्त होता है।
हिमाचल प्रदेश के चिंतपूर्णी स्थित ग्रीन वैली में आयोजित विशाल सत्संग समारोह को संबोधित करते हुए बाबा उमाकांत जी महाराज ने कहा कि धार्मिक आयोजन और प्रवचन तो अनेक होते हैं, लेकिन सच्चा सत्संग दुर्लभ होता है। सच्चा सत्संग मनुष्य को जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझाने के साथ-साथ सुख, शांति और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है।
मानव जीवन का उद्देश्य समझने के लिए सत्संग आवश्यक
उन्होंने कहा कि मनुष्य शरीर पांच तत्वों से बना है और इसका उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण करना भी है। सत्संग के अभाव में मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को नहीं समझ पाता और अज्ञानतावश ऐसे कर्म कर बैठता है जिनका परिणाम उसे दुख के रूप में भोगना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्संग सुनकर अच्छे कर्मों का मार्ग अपनाना चाहिए।
नामदान का लाभ स्वयं अनुभव करें
नामदान से पूर्व श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए बाबा जी ने कहा कि यदि किसी ने पहले किसी गुरु से दीक्षा ली है तो उनका सम्मान अवश्य करें, लेकिन यह भी परखें कि उनके बताए मार्ग से उन्हें कितना लौकिक, पारलौकिक और आध्यात्मिक लाभ मिला। उन्होंने कहा कि जो नाम और साधना का मार्ग बताया जा रहा है, उसे स्वयं करके देखें। यदि उससे जीवन में शांति, सुख और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव हो तो उसे अपनाना चाहिए।
सभी के लिए खुला है आध्यात्मिक मार्ग
बाबा जी ने कहा कि यह आध्यात्मिक मार्ग किसी विशेष जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, अमीर हो या गरीब, विद्यार्थी, कर्मचारी, व्यापारी या मजदूर—हर व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकता है। इसके लिए घर-परिवार त्यागने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
“तजो नशा, बनो शाकाहारी”
सत्संग के दौरान बाबा जी ने सभी से नशामुक्त, सदाचारी और शाकाहारी जीवन अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जीवों पर दया करना ही सच्ची मानवता और धर्म का आधार है। मनुष्य को ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी बेजुबान जीव को कष्ट पहुंचे।
उन्होंने कहा कि दया, प्रेम और अहिंसा का मार्ग ही मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। समाज में शांति और खुशहाली के लिए नशे और हिंसा से दूर रहना आवश्यक है।
कर्मों का फल अवश्य मिलता है
बाबा उमाकांत जी महाराज ने कहा कि प्रकृति का न्याय अटल है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही परिणाम प्राप्त होता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अहंकार और अधर्म के मार्ग पर चलने वाले रावण की सोने की लंका, अपार धन-संपत्ति और विशाल साम्राज्य भी उसे विनाश से नहीं बचा सके। इसी प्रकार महाभारत में कौरवों के पास विशाल सेना और शक्ति होने के बावजूद धर्म का साथ न देने के कारण उनका सब कुछ समाप्त हो गया।
नशामुक्त और शाकाहारी समाज से बनेगा खुशहाल राष्ट्र
अपने संदेश के अंत में बाबा जी ने कहा कि यदि समाज नशामुक्त, शाकाहारी और सदाचारी बन जाए तो परिवार, समाज और देश में सुख, शांति तथा खुशहाली का वातावरण स्थापित हो सकता है। उन्होंने सभी लोगों से अच्छे कर्म, दया, शाकाहार और ईश्वर भक्ति को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।



