अवैध कब्जाधारियों पर चुनावी सख्ती: 1.60 लाख लोग पंचायत चुनाव से बाहर, स्वघोषणा में झूठ पर होगी कड़ी कार्रवाई

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ब्यूरो रिपोर्ट

हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर सख्ती बढ़ा दी गई है। सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा स्वीकारने वाले करीब 1.60 लाख लोग और उनके परिजन इस बार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। वर्ष 2003 में अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए इन परिवारों ने स्वघोषणा के साथ अपने दस्तावेज सरकार को सौंपे थे, जिनकी मिसलें अब रिकॉर्ड में मौजूद हैं।राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं होगा। 29 दिसंबर 2020 को भी राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।नामांकन के दौरान प्रत्येक उम्मीदवार को स्वयं सत्यापित (Self-Declaration) फार्म भरना अनिवार्य होगा। इस फार्म में पांच अहम बिंदु शामिल होंगे—चिट्टे में संलिप्तता, सहकारी बैंक डिफॉल्टर, लंबित ऑडिट रिकवरी, सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा आदि। यदि जांच में किसी भी प्रकार की संलिप्तता पाई जाती है, तो उम्मीदवार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यहां तक कि चुनाव जीतने के बाद भी दोषी पाए जाने पर जनप्रतिनिधियों को पद से हटाया जा सकता है।इस बीच, प्रदेश की 3757 पंचायतों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी कर दिया गया है। जिला प्रशासन और पंचायतीराज विभाग ने तय समयसीमा के भीतर यह प्रक्रिया पूरी कर दस्तावेज राज्य निर्वाचन आयोग को सौंप दिए हैं। आयोग 20 अप्रैल को पंचायत चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम जारी करेगा, जबकि 31 मई से पहले पूरे प्रदेश में चुनाव संपन्न करवाने का लक्ष्य रखा गया है।चुनाव को लेकर प्रशासनिक तैयारियां अंतिम चरण में हैं। उपायुक्तों को मतदाता सूचियों, मतदान केंद्रों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, आचार संहिता के सख्त पालन पर भी जोर दिया गया है।इसके अलावा, करीब 200 पूर्व जनप्रतिनिधि और उनके परिवार के सदस्य भी इस बार चुनावी मैदान से बाहर रहेंगे। इन पर पंचायत स्तर पर अनियमितताएं और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोप हैं। जांच के बाद इनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, सरकार की गाइडलाइंस के अनुरूप ही सभी चुनावी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। साफ है कि इस बार पंचायत चुनाव में सख्त नियमों के चलते नए चेहरों को मौका मिलने की संभावना बढ़ गई है।

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