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ज़ीरो टैक्स पर किसानों का भविष्य दाँव पर, केंद्र सरकार खामोश: विक्रमादित्य सिंह

शिमला (विकास शर्मा ,ब्यूरो चीफ )

संभावित भारत–अमेरिका व्यापार समझौते में कृषि क्षेत्र पर शून्य आयात शुल्क की बात सामने आने के बाद देश की कृषि अर्थव्यवस्था एक अत्यंत समझौतापूर्ण स्थिति में खड़ी दिखाई देती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा यह दावा किया गया है कि भारत अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि सहित अन्य उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद के लिए प्रतिबद्ध हुआ है और अपने शुल्क व गैर-शुल्क अवरोधों को शून्य की दिशा में ले जाएगा। इस प्रकार की प्रतिबद्धताएँ यदि बिना व्यापक जन–विमर्श, संसदीय बहस और किसानों के प्रतिनिधि संगठनों से परामर्श के की जाती हैं, तो यह सीधे तौर पर भारत के करोड़ों किसानों, बागवानों और कृषि–निर्भर श्रमिकों के हितों के साथ समझौता है।

भारत के कृषि क्षेत्र की बुनियादी संरचना अभी भी छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है, जिनकी प्रतिस्पर्धा सीधे तौर पर विकसित देशों की उच्च सब्सिडी प्राप्त, कारपोरेट नियंत्रित कृषि से कराना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। यदि बड़े पैमाने पर अमेरिकी कृषि उत्पादों—विशेषकर अनाज, तिलहन, दालों, फल–सब्ज़ी और डेयरी–उत्पादों—को शून्य या अत्यल्प आयात शुल्क पर भारतीय बाज़ार में प्रवेश दिया जाता है, तो इसका तात्कालिक परिणाम घरेलू कीमतों में गिरावट, किसानों की आय में और अधिक संकुचन और पहले से जूझ रहे ग्रामीण रोज़गार संकट के गहराने के रूप में सामने आएगा। यह भी चिंताजनक है कि जिन क्षेत्रों में भारत परंपरागत रूप से संवेदनशील रुख रखता रहा है, जैसे डेयरी और कुछ अन्य कृषि–उत्पाद, वहाँ भी बाहरी दबावों के आगे झुकने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि केंद्र सरकार ने अभी तक न तो इस तथाकथित समझौते का आधिकारिक, विस्तृत मसौदा देश के सामने रखा है, न ही स्पष्ट किया है कि किन कृषि–उत्पादों पर शुल्क शून्य करने की बात हो रही है और इसका घरेलू किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। एक ओर अमेरिका के कृषि सचिव सार्वजनिक रूप से अपने किसानों को आश्वस्त कर रहे हैं कि यह सौदा अमेरिकी किसानों के लिए लाभकारी होगा, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार अपने ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, प्राकृतिक आपदाओं और बढ़ती लागत के बीच असुरक्षित छोड़कर चुप्पी साधे बैठी है। यह स्थिति यह संदेश देती है कि वर्तमान शासन के लिए कृषि–क्षेत्र और ग्रामीण भारत केवल समझौते की मेज पर रखी एक सौदेबाज़ी की वस्तु बनकर रह गया है, जिसकी कीमत भारतीय किसान अपने पसीने और कर्ज़ के बोझ से चुकाएंगे।

नीति–निर्माण का न्यूनतम लोकतांत्रिक दायित्व यह है कि ऐसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते से पहले संसद में विस्तृत चर्चा हो, राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विशेषकर कृषि–प्रधान राज्यों की सरकारों से परामर्श किया जाए और किसान संगठनों, सहकारी संस्थाओं व कृषि–विशेषज्ञों की राय ली जाए। लेकिन आज स्थिति उलट है—निर्णय बंद कमरों में लिए जा रहे हैं, घोषणाएँ विदेशी मंचों और निजी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर हो रही हैं और देश के किसानों, बागवानों तथा ग्रामीण युवाओं को केवल परिणाम भोगने के लिए छोड़ दिया गया है। यह न केवल संघीय ढांचे की अवहेलना है, बल्कि उस संवैधानिक दायित्व से भी विमुख होना है जिसके तहत सरकार पर किसानों की आजीविका की रक्षा करने और कृषि–क्षेत्र को सुदृढ़ करने की ज़िम्मेदारी है।

कुल मिलाकर, प्रस्तावित शून्य शुल्क व्यवस्था और उसके इर्द–गिर्द उभरे एकतरफा दावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का कृषि–क्षेत्र इस समय एक गहरी असुरक्षा और समझौते की स्थिति में धकेला जा रहा है, जबकि सरकार अपने ही किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए अपेक्षित स्पष्टता, दृढ़ता और पारदर्शिता दिखाने में विफल रही है। यदि तुरंत प्रभाव से इस पर स्पष्टीकरण, पुनर्विचार और व्यापक संवाद की प्रक्रिया शुरू नहीं की जाती, तो आने वाले वर्षों में इसका गंभीर प्रभाव न केवल किसानों की आय पर पड़ेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और देश की सामाजिक स्थिरता पर भी दूरगामी और नकारात्मक परिणाम छोड़ जाएगा।

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