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राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने शिक्षा बोर्ड और शिक्षा विभाग से उठाई मांग

शिमला (विकास शर्मा, ब्यूरो चीफ),

राजकीय भाषायी अध्यापक संघ के राज्य अध्यक्ष हेमराज ठाकुर, महासचिव अर्जुन सिंह, कोषाध्यक्ष ललित कुमार, संघ के संस्थापक नरेन्द्र कुमार शर्मा, महिला मोर्चा की राज्य अध्यक्षा मीरा शर्मा, सचिव डा तारा और संयोजक धनवीर सिंह के साथ – साथ सभी जिलों के प्रधानों और संघ के समस्त शिक्षकों ने हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला के अध्यक्ष और सचिव से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही उस खबर की कटिंग की पुष्टि करने की मांग उठाई है, जिसमें शैक्षणिक सत्र 2024-2025 की वार्षिक परीक्षाओं के प्रश्न पत्र पुनः इस बार मार्च में भी पुरानी ही तहजीब की ए, बी और सी सीरीज में पूछने की बात की जा रही है। संघ के राज्य अध्यक्ष हेमराज ठाकुर ने बताया कि हमारे संघ ने इस विषय को बोर्ड और शिक्षा विभाग से पिछले साल भी समाचार पत्रों और पत्राचारों के माध्यम से उठाया था। उन्होंने कहा कि उसके परिणाम स्वरूप बोर्ड और शिक्षा विभाग ने इस सत्र से अलग – अलग सीरीज में अलग – अलग प्रश्न न डालने की बात अखबारों में खबर लगाकर की थी और सभी सीरीजों में एक ही प्रकार के प्रश्न पूछने की सहमति प्रदान की थी। ठाकुर ने बताया कि यदि यह वायरल अखबार की खबर बोर्ड की ही सहमति से प्रसारित हुई है, तो बोर्ड एक बार फिर से इस मुद्दे पर छात्र हित में गम्भीरता से विचार कर के निर्णय लें। हेमराज ने बताया कि अलग अलग सीरीज में अलग अलग प्रश्न पूछे जाने से छात्रों के साथ अन्याय हो रहा है और यह समानता के अधिकार का भी हनन है।

हेमराज ने बताया कि अलग अलग सीरीज में अलग अलग प्रश्न पूछे जाने से मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता और वैधता की बाधित होती है। इसलिए हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग और शिक्षा बोर्ड इस मुद्दे पर छात्र हित में गम्भीरता से विचार करें, ताकि किसी को कठिन और किसी को आसान सीरीज की असमानता के कारण परेशान न होना पड़े। यह मांग हिमाचल प्रदेश राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने बोर्ड और शिक्षा विभाग के समक्ष उठाई है।बच्चों के साथ न्याय किया जाना चाहिए। जैसे CBSE में पूछा जाता है,वैसे हिमाचल बोर्ड में भी किया जाना चाहिए जी। यही मांग बच्चों की,अभिभावकों की और शिक्षकों की है। वरना अलग अलग सीरीज में अलग अलग प्रश्न पूछे जाते हैं और इससे किसी को आसान प्रश्न और किसी को कठिन प्रश्न आते हैं। ऐसे में मूल्यांकन प्रणाली के वैधता और विश्वसनीयता के दोनों घटक बेकार हो जाते हैं। जैसा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में होता है,वैसा किया जाना चाहिए। वैसे बोर्ड मान गया था पर फिर एक दम वही पैटर्न रखने की बात करना समझ में नहीं आ रहा है जी। इसलिए इस मुद्दे पर फिर से विचार किया जाना चाहिए शायद। जब पाठयक्रम प्रदत्त प्रश्नों को तीन भागों में बांटना पड़ता है तो कई बार यह देखा गया है कि दो श्रृंखलाएं सरल और एक तो अत्यधिक कठिन रहती है या कोई एक श्रृंखला कठिन और दो सरल होती हैं जिससे कि समानता के अधिकार का भी हनन देखा जा सकता है जबकि सभी को एक समान प्रश्न पत्र रहना चाहिए | प्रश्न पत्र में भिन्नता और अंकों में समता कैसे संभव है? यदि सभी को अंक आधार पर ही मूल्यांकन मिलना है तो एक कक्षा एक प्रश्न पत्र आधार पर मिले। जिससे कि विद्यार्थियों के साथ अन्याय न हो।

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