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हिमाचल सरकार भी कर्मचारियों के डी ए की बकाया राशि जारी करे


शिमला ( विकास शर्मा , ब्यूरो चीफ )


हिमाचल प्रदेश राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पश्चिम बंगाल सरकार को वर्ष 2009 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता (DA) तुरंत जारी करने के आदेश का स्वागत किया है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा शामिल थे, ने स्पष्ट रूप से कहा है कि महंगाई भत्ता कोई खैरात नहीं बल्कि कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार है।
संघ के प्रदेशाध्यक्ष हेमराज ठाकुर, महासचिव अर्जुन सिंह,प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष मीरा शर्मा, संघ के संस्थापक नरेन्द्र कुमार शर्मा, संयोजक धनवीर नायक सहित समस्त जिला पदाधिकारियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के सरकारी कर्मचारियों के लिए मील का पत्थर है। प्रदेश अध्यक्ष हेमराज ठाकुर ने कहा कि अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि राज्य सरकारें खजाने की तंगी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के हक को नहीं रोक सकतीं। उन्होंने कहा कि अदालत की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि DA वेतन का अनिवार्य हिस्सा है।
यह समय समय पर वेतनमान के हिसाब से साथ बढ़ाने वाला वाला भत्ता है। नियमों में मनमाने बदलाव कर के इसे रोका नहीं जा सकता। कर्मचारियों की “वैध अपेक्षा” को तोड़ना असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन यह दर्शाता है कि अदालत कर्मचारियों को उनका बकाया दिलाने के लिए पूरी तरह गंभीर है।
हिमाचल प्रदेश राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने हिमाचल प्रदेश सरकार से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सबक लेते हुए राज्य के कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित DA/महंगाई भत्ते का 13% बकाया भुगतान समय रहते करें लें। हेमराज ने बताया कि इससे लगभग चार हजार से दस हजार तक का आर्थिक नुकसान प्रति कर्मचारी मासिक तौर पर झेल रहा है। हेमराज ने सरकार से किसी प्रकार की टालमटोल से बचने का आग्रह किया है और प्रदेश के कर्मचारियों के साथ आर्थिक न्याय करने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार समय रहते प्रदेश के कर्मचारियों की इस वाजिब मांग को पूरा नहीं करती है तो हिमाचल प्रदेश के कर्मचारियों को भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा। ठाकुर ने कहा कि हिमाचल के कर्मचारी नहीं चाहते कि हर बात कोर्ट से ही लड़ कर ली जाए। इसलिए सरकार इस विषय पर सहानुभूतिपूर्वक गम्भीरता से विचार करें।
भाषायी अध्यापक संघ ने चेतावनी दी कि यदि कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी जारी रही तो संगठन कानूनी और लोकतांत्रिक रास्तों से संघर्ष करने के लिए बाध्य होगा।
अंत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश की सरकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि“कर्मचारियों के आर्थिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।”

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