अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेला आरंभ: परशुराम–मां रेणुका के दिव्य मिलन के साक्षी बनेंगे लाखों श्रद्धालु

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श्री रेणुकाजी (हेमंत चौहान, संवाददाता),


हिमाचल प्रदेश के प्राचीनतम और श्रद्धापूर्ण आयोजनों में से एक अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेला आज विधिवत आरंभ हो गया। कार्तिक मास की शुभ तिथि पर आरंभ हुए इस छह दिवसीय मेले में श्रद्धा, संस्कृति, भक्ति और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। यह मेला मां श्री रेणुका और उनके पुत्र भगवान परशुराम के दिव्य मिलन का प्रतीक है, जिसकी प्रतिक्षा श्रद्धालु वर्ष भर करते हैं।मेला परिसर एवं संपूर्ण तीर्थभूमि श्री रेणुकाजी में आज प्रातः से ही भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। सरोवर तट पर धर्म, आस्था और उत्साह का अनुपम दृश्य देखने को मिल रहा है। रेणुका सरोवर के शांत जल पर मंजीरों की ध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और भक्ति गीतों का स्वर वातावरण में आस्था की अलौकिक छटा बिखेर रहा है।मेले का औपचारिक शुभारंभ आज सायं 6ः35 बजे रेणु मंच पर मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू दीप प्रज्ज्वलित कर करेंगे तथा प्रथम सांस्कृतिक संध्या में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। इससे पूर्व दोपहर 1ः35 बजे वह ददाहू में देव अभिनंदन कार्यक्रम एवं भव्य शोभायात्रा को रवाना करेंगे।उपायुक्त सिरमौर एवं श्री रेणुकाजी विकास बोर्ड की उपाध्यक्ष प्रियंका वर्मा ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। सुरक्षा, यातायात एवं चिकित्सा सुविधाओं के लिए व्यापक प्रबंध किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इस बार मेले में कई नई व्यवस्थाएं एवं श्रद्धालुओं हेतु सुविधाएं बढ़ाई गई हैं।श्री रेणुकाजी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, अपितु मातृत्व और पुत्र भक्ति की अनूठी परिकल्पना का उत्सव है। जनश्रुति है कि भगवान परशुराम वर्ष में एक बार कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपनी माता रेणुका से मिलने आते हैं। इसी परंपरा की स्मृति में यह मेला कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित होता है।झील तट स्थित प्राकृतिक रेणुका झील, जिसका स्वरूप नारी देह जैसा है, इस तीर्थभूमि की आस्था का केंद्र है। झील किनारे स्थित माता रेणुका और भगवान परशुराम के भव्य मंदिर इस तीर्थ स्थली की अमर पवित्रता को दर्शाते हैं।मेले के दौरान प्रतिदिन मां रेणुका की भव्य आरती का आयोजन होगा। पांच दिवसीय सांस्कृतिक संध्याओं में प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। अंतिम दिन भगवान परशुराम कथा का भव्य मंचन प्रस्तावित है।वहीं आसपास के पर्वतीय क्षेत्र से देवी–देवताओं की सज्जित पालकियां यात्री दलों के साथ मेले में पहुंचेंगी, जो देवभूमि परंपरा का अनुपम नजारा प्रस्तुत करेंगी।एकादशी तिथि (1 नवंबर) को प्रातः 4 बजे तथा कार्तिक पूर्णिमा (5 नवंबर) को रेणुका झील में पवित्र स्नान का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने बैरिकेडिंग, सुरक्षा घेरा एवं जल पुलिस की तैनाती की है।यातायात व्यवस्था हेतु अतिरिक्त पार्किंग तथा बस सेवाओं की व्यवस्था की गई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा चिकित्सा शिविर और आपातकालीन सेवा दल तैनात किए गए हैं।यह मेला उस पौराणिक कथा पर आधारित है जो भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम और माता रेणुका के शाश्वत प्रेम, ऋषि परंपरा, त्याग और तप के गौरव को दर्शाती है। कहा जाता है कि परशुराम ने अपनी तपश्चार्य और प्रतिज्ञा के माध्यम से अधर्म का नाश किया और अपने माता–पिता को पुनर्जीवित कर ब्रह्माण्ड को धर्म का संदेश दिया।युगों से यह पावन कथा जनमानस में मातृ–भक्ति, आस्था और धर्म-संरक्षण का प्रेरक संदेश देती आ रही है।
अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेला आज भी हजारों वर्षों पुरानी आस्था, सांस्कृतिक धरोहर, लोक परंपरा और देव संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। आने वाले दिनों में श्रद्धालुओं का भारी सैलाब यहां उमड़ेगा और देवभूमि की यह पुण्यभूमि भक्तिरस और सांस्कृतिक उल्लास में डूबी रहेगी।

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