शिमला ( विकास शर्मा , ब्यूरो चीफ ),
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी विद्यालयों में CBSE प्रणाली लागू करने तथा इसके लिए अलग से टेस्ट आधारित चयन, विशेष इंसेंटिव और अलग कैडर व्यवस्था अपनाने के निर्णय पर हिमाचल प्रदेश राजकीय भाषाई अध्यापक संघ ने गहरी आपत्ति दर्ज की है। संघ का स्पष्ट मत है कि यह व्यवस्था शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि शिक्षकों और छात्रों के बीच असमानता, प्रतिस्पर्धा और हीन-भावना को बढ़ावा देने वाली नीति है।
संघ के राज्य अध्यक्ष हेमराज ठाकुर, महासचिव अर्जुन सिंह, महिला मोर्चा अध्यक्षा मीरा शर्मा, संस्थापक नरेन्द्र शर्मा, संयोजक धनवीर नायक तथा समस्त जिला कार्यकारिणियों के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से कहा कि एक ही पद, एक ही कार्य, एक ही विभाग और एक ही योग्यता होने के बावजूद यदि दो अलग-अलग कैडर बनाए जाते हैं—एक को विशेष वेतन इंसेंटिव और दूसरे को उससे वंचित रखा जाता है—तो यह संवैधानिक समानता और सेवा शर्तों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
संघ का सवाल है कि क्या केवल एक टेस्ट पास कर लेने से कोई शिक्षक अचानक अधिक “इंटेलिजेंट” हो जाता है?
जो शिक्षक वर्षों से HP बोर्ड के विद्यालयों में पढ़ा रहा हैं, क्या वे तब अयोग्य थे? और अचानक एक टेस्ट दे कर वह इंटेलिजेंट बन गया, जो उसे CBSE में ज्वाइन करते ही उसे इंसेंटिव दिया जाएगा। जब तक वह HP बोर्ड शिक्षण संस्थानों में था तब उसे कोई इंसेंटिव नहीं दिया गया। क्या तब उसकी कार्य क्षमता बच्चों और शिक्षण के प्रति कमजोर थी ? अगर नहीं तो उसे वहां भी इंसेंटिव क्यों नहीं दिया गया? यदि कार्य, पद और दायित्व समान हैं, तो वेतन और इंसेंटिव में भेद क्यों?
संघ स्पष्ट करता है कि सरकार को पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा लेने का अधिकार है, परंतु पोस्ट-टू-पोस्ट टेस्ट के माध्यम से अलग-अलग बोर्ड के नाम पर शिक्षकों में प्रतिस्पर्धा और विद्वेष पैदा करना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह नीति शिक्षकों को सुविधा-सम्पन्न कस्बाई विद्यालयों में आर्थिक लाभ के लिए खींचने का माध्यम बनती जा रही है, न कि शिक्षा की मूलभूत समस्याओं के समाधान का।
संघ ने आशंका जताई कि इस व्यवस्था से
CBSE में चयनित शिक्षक स्वयं को श्रेष्ठ और शेष शिक्षक हीन समझेंगे,
CBSE में पढ़ने वाला छात्र स्वयं को “इंटेलिजेंट” और HP बोर्ड का छात्र हीन समझेगा,
जिससे इन्क्लूसिव शिक्षा व्यवस्था की मूल भावना को गहरी चोट पहुंचेगी।
संघ ने यह भी प्रश्न उठाया कि आजादी के 75 वर्ष बाद भी CBSE जैसे संसाधन-सम्पन्न स्कूल मुख्यतः कस्बाई क्षेत्रों में ही क्यों खोले जा रहे हैं?
जबकि इन स्कूलों की वास्तविक आवश्यकता ठेठ ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में है, जहां से अच्छी शिक्षा के अभाव में पलायन हो रहा है। इस पलायन के कारण
गांव के बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं,
भारतीय परिवार व्यवस्था विघटित हो रही है,
जो अत्यंत गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही हैं। हेमराज ने कहा कि शहरों और कस्बों में तो अच्छी शिक्षा व्यवस्था के संस्थान पहले ही मौजूद है, फिर चाहे वे निजी ही क्यों न हो। इसलिए CBSE स्कूल गांव में खुलने चाहिए और उनमें नए शिक्षक भर्ती किए जाने चाहिए न कि शिक्षा विभाग में पहले से कार्यरत अध्यापकों को दो भागों में बांटना चाहिए।
संघ का मत है कि एक अच्छे शिक्षक की पहचान किसी एक टेस्ट से नहीं की जा सकती। एक शिक्षक का मूल्यांकन उसके :-
नैतिक और मानवीय मूल्यों,
कक्षा संचालन,
शिक्षण-अधिगम क्षमता,
वार्षिक परीक्षा परिणाम,
छात्र-अभिभावक संतुष्टि
और शैक्षणिक नेतृत्व
के आधार पर होना चाहिए, न कि रट्टा-आधारित किसी परीक्षा( टेस्ट) से।
संघ निम्न सुधारात्मक सुझावों के साथ CBSE व्यवस्था को अपनाने की बात करता है—
CBSE स्कूलों की अधिकतम संख्या ठेठ ग्रामीण क्षेत्रों में खोली जाए।
ये स्कूल RTE अधिनियम के अंतर्गत पूर्णतः इन्क्लूसिव हों, जहां किसी भी प्रकार का सामाजिक, आर्थिक या बौद्धिक भेदभाव न हो।
CBSE और HP बोर्ड के शिक्षकों के बीच ट्रांसफर टेन्योर में कोई भेदभाव न किया जाए। संघ ने यह भी कहा कि यही स्कूल दस साल की रिटेंशन और इंसेंटिव प्रावधानों के साथ अगर दूरदराज के ठेठ ग्रामीण इलाके में खुलते हैं तो टेस्ट देने वाला अध्यापक ही नहीं मिलेगा। फिर यह गुणवत्ता शिक्षा और सरकारी स्कूलों से पलायन को रोकने के लिए कैसे कारगर होंगे?
इंसेंटिव यदि देना है तो दोनों बोर्डों के शिक्षकों को समान रूप से प्रदर्शन आधारित दिया जाए, अन्यथा किसी को नहीं।
CBSE स्कूलों में पहले से मौजूद शिक्षकों को ही शिक्षण हेतु नियमित किया जाए। उन्हें किसी वैकल्पिक व्यवस्था में न डाल जाए।
बिना TET पास शिक्षकों की नियुक्ति किसी भी बोर्ड में न की जाए; TET में छूट अवैधानिक है। संघ ने कहा जो बिना स्ट्रीम घोषित किए हुए नए अध्यापक बिना TET के CBSE स्कूलों में रखे जा रहे हैं,वह भी हिमाचल के बेरोजगार TET पास बेरोजगारों के साथ धोखा है और NCERT आदि के शिक्षण प्रावधानों को बाय पास करना है। यह बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।
संघ ने यह भी मांग की कि जिन विद्यालयों को CBSE में बदला गया है, वहां पहले से पढ़ रहे छात्रों को HP बोर्ड में यदि पढ़ना है तो उन छात्रों को उसी विद्यालय या नजदीकी विद्यालय में, सरकारी परिवहन सुविधा के साथ पढ़ने का स्पष्ट और लिखित प्रावधान किया जाए, क्योंकि यह RTE अधिनियम के अंतर्गत बच्चों का मौलिक अधिकार है।
अंत में संघ ने सरकार से आग्रह किया कि इस प्रकार के बड़े शैक्षणिक परिवर्तन लागू करने से पूर्व सभी शिक्षक संगठनों से व्यापक संवाद किया जाए। शिक्षा सुधार का रास्ता विभाजन और प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि समानता, संवेदनशीलता और सार्वजनिक हित से होकर जाता है।
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